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महान शक्तिदायक ‘महा शिवरात्री’

✍️  राजयोग मैडिटेशन सेवाकेंद्र, प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय

जो सबके भले का सोचता हैं उसे हार कोई पसंद करता हैं, क्यों की वो किसी में भेदभाव नहीं रखता। ऐसी प्रतिभा वाले व्यक्ति को लोग, समाज देवतुल्य मानते हैं , और कभी तो उसकी पूजा तक भी होती हैं। क्यूँ की ऐसा व्यक्ति निस्वार्थ भावना से सदा दाता बन दूसरों को देता हैं बिना किसी से कुछ पाने की अपेक्षा किये। इसलिए ऐसे चरित्र को हर कोई पसंद करता हैं- पूजता हैं।

ध्यान देने लायक बात यह निकलती हैं की हड्डी-मास के पुतले ‘मनुष्य’ को देवता की उपाधि मिल सकती हैं तो ….. ब्रह्माण्ड में गुण, शक्तियां, विशेषताएं, सकारत्मकता, सुख-शांति, जिसकी वजह से इनका अस्तित्व हैं वो गुण महासागर ईश्वर, परमात्मा उसको कितना पसंद किया जाता होगा। और उनकी इतनी पसंदी क्यूँ न हो ? जो किसी में भी, कोई भी भेद नहीं करता, जिसके आगे सब एक समान हैं, जो सिर्फ और सिर्फ परोपकार ही करते हैं और निरंतर करते हैं। जो निराकार अजन्मा होने के बावजूद यह सब करता हैं तो उनकी ख्याति, महत्व कितना होगा और कोई कितना भी उनका गुणगान करना चाहे तो भी वो कम ही होगा।

जो बात हमेशा एक जैसी रहती हैं, कभी बदलती नहीं उसे सत्य कहा जाता हैं। शिव परमात्मा का एक नाम हैं ‘अज’ अर्थात “अ + जन्मा ” – यानी की जिसका न तो जन्म होता हैं और न कभी मृत्यु होती हैं। जो सदैव एक जैसा ही रहता हैं , जिसका मूल रूप कभी भी बदलता नहीं। अतः जन्म – मरण के परे सदा निराकार स्वरूप, सत्य-चैतन्य-आनंद स्वरूप में, सदा विश्व कल्याणकारी-परोपकारी रूप में जो कायम हैं ऐसा ‘ एक लिंग ‘ परमात्मा।

लिंग शब्द का अर्थ हैं – प्रतिक, प्रतिमा, प्रतिकृति। परम पिता शिव परमात्मा का सत्य रूप, जैसे मनुष्यों के शरीर बदलते हैं वैसे कभी भी बदलता नहीं इसलिए उनका नाम भक्तों ने रखा ‘एक लिंग’। इसके भी आगे, जो जन्म मरण से परे हैं अर्थात जिस पर काल (समय, गति) का कोई असर नहीं हैं, जो काल जीत हैं, वह ‘महाकाल’। शिव शब्द का उचित अर्थ हैं निरंतर कल्याण करनेवाला। मोहनजोदारो संस्कृति में शिव शब्द का पर्यायवाचक शब्द ‘शून्य’ ऐसा भी था। निराकार रूप को परिभाषित करने का यह एक प्रयास था। क्यूँ की शून्य की शक्ति महान हैं, वह अनन्य साधारण हैं। शून्य अर्थात बिंदुरूप या ज्योतिस्वरूप भी समझा गया। रूप अर्थात लिंग इसलिए समूचे भारत और विश्व भर में ‘शिवलिंग’ के नाम से कई पवित्र स्थल बने। बड़बोला हिसाब तो नहीं लेकिन एक वास्तविकता अगर बताएं तो समझेगा की लगभग १ लाख से सवा लाख जितने नाम, दयासागर परमात्मा शिव के हैं।

इतने नाम यूँही तो नहीं रखे गए होंगे। जरूर परमात्मा ने कभी कुछ दिव्य कर्तव्य किये होंगे जिनके के कारण वो प्रचलित हुए होंगे। तो फिर इतने नामों का क्या राज़ होगा? और कहीं इसमें एक इशारा भी तो होगा की इतने नाम एक झटके में नहीं लगे होंगे, जरूर इसके साथ कुछ इतिहास जुड़ा हुआ होगा। बिलकुल सही इशारा हैं, भारत प्राचीन तो इसकी संस्कृति भी प्राचीन। लेकिन प्राचीन कह कर उसे जीवन से दरकिनार करें या उसकी सही समझ से खुद को और देश को गौरवान्वित करें। पर हालत यह हैं की प्राचीन गौरवशाली इतिहास से निकलकर कर आज नैतिक पतन की कगार पर आ पहुँचे हैं और ‘प्राचीन’ का महत्व केवल शब्दों में कैद रह गया या थोड़े बहुत अवशेष मात्र रह गए।

महाशिवरात्रि उस गौरव को फिर से जीवित करने का महापर्व हैं और एक सुनहरा अवसर भी। महाशिवरात्रि मात्र एक दिन की तिथि नही हैं लेकिन यह आज की मानव जीवन का प्रतिक अंधियारी कालरात्री की दशा का आईना हैं। जीवन के इन हालातों में जिन्हे हम युगों युगों से पुकार रहे थे, जिसे धरती पर आकर हमें इस बंधन से छुड़ाने की मिन्नत कर रहे थे वह दुःखभंजक ईश्वर, मुक्तिदाता सत्यज्ञान प्रकाश देकर आध्यात्मिक अज्ञान अन्धकार रात्रि का नाश करने के लिए हमारी पुकार पर अवतरित हुआ हैं। किसी में भी किसी प्रकार का भेदभाव न करते हुए अपना दिव्य सन्देश दे रहा हैं की ‘मेरे प्रिय वत्सों, तुम हड्डीमास से बने शरीर नहीं, लेकिन मेरी तरह एक दिव्य चेतन ऊर्जा हो, इस अपने सत्य रूप में मन को स्थिर कर, मुझ अपने निराकार पिता, ज्योतिरूप परमात्मा को याद करो तो मैं वचन देता हु मैं तुम्हारे पाप नष्ट करूँगा और संसार को फिर से सुनहरा सत्ययुग बनाऊंगा’।

मनुष्य कहता हैं यह जीवन परमात्मा की देन हैं। अगर ऐसा हैं तो क्या वो जीवन छोड़कर नामजप करने की सलाह दे सकता हैं ? बल्कि वो तो कह रहा हैं जीवन में रहते परम अर्थ को साधने की कला अपनाओ और मेरी तरह सुख स्वरूप बनो। इसके लिए जरूरत हैं- जीवन यापन करते हुए मन को सर्व शक्तिदाता, सकारत्मकता का सागर, शिव पिता परमात्मा के साथ जोड़े रखना। क्यूँ की कहावत हैं मन जीते, जगत जीत। मन की कमजोरियॉं नष्ट करने, सही जगह मन जोड़ना, विकारों से उपवास, शुद्ध विचारों का सेवन करना यही रोजमर्रा की जीवन में हमसे भगवान चाहते हैं। इसलिए शिवरात्रि केवल एक दिन की तिथि न हो कर यह जीवन का सार हैं, यहाँ से ही सुखी शांत और समृद्ध जीवन का मार्ग प्रशस्त होता हैं।

मित्रों – पंचाँग तिथि के निमित्त पधारे इस पावन पर्व महाशिवरात्रि पर आएं हम सब एक संकल्प करें की महान शक्ति दाता परमपिता का वर्सा पाने, स्वयं को और भारत भूमि को वही गौरव दिलाने के लिए फिर से भाग्यविधाता शिव से मन को जोड़ते हैं और शिवरात्रि के सच्चे अर्थ को निभाते हैं। सतज्ञान प्रकाश पर्व महाशिवरात्रि की सभी को कोटि कोटि बधाईयाँ।

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