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Poem : कितना माफ़ करूं तुझे ओ सनम…

✍️  मनीषा झा ‘मन’, मुंबई, महाराष्ट्र

कितना माफ़ करूं तुझे ओ सनम
मैं कितना माफ़ करूं,
तुम्हें हर कुछ पता है हर कुछ से रूबरू है तू
फिर क्यों अंजान बने घूम रहा है तू
तुझे कितना माफ करू

मेरी हर कमजोरियां की ताकत हो तुम ,
फिर जानबूझ के नादानियां करते हो तुम,
कहते हो आखों में आंसू मत लाना कभी
फिर खुद ही अश्कों से नाता जोड़ देते हो तुम,

क्यों इतना दर्द देते हो तुम क्या कसूर है मैंने किया
हर एक मेरी बात को विपरीत ही समझते हो तुम
कहते हो तुम्हारे लिए दुनिया छोड़ दूंगा लेकिन,
जो मुझे पसंद नही वो आदत भी नही छोड़ पाते हो तुम

आएं थे मेरे जिंदगी हर दर्द की दवा बनके,
फिर क्यों मेरे दर्द से दोस्ती कर बैठे हो सनम,
कभी मेरे जगह रख के जरा सोचो न सनम
कितनी गलतियां करते जा रहे हो तुम,

हर एक चीज को भुला के तुमसे नाता है जोड़ा,
दुनियां के नजर में बदनाम होने लगे हैं हम,
जब तूही मेरा सहारा नहीं बनेगा इस जिवन में,
फिर तेरे बिना कहां जाएंगे सनम,

क्या कभी तुम्हे कभी एहसास नहीं होती
या ना अहसास करने का कसम खाए हो तुम,
दिन रात दिल दुखाते जाते हो कैसे दिखाऊं तुझे
कैसे मैं भूल जाऊ सब जो किए ही वादे सपने

और कितना माफ करू तुझे ओ सनम
और कितना माफ करू …

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