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संस्मरण : भूरा

✍️ सुनीता गोंड, वाराणसी

न शहर न ही गांव ना ही शोर और ना ही सन्नाटा दूर एकान्त में बसा एक छोटा सा घर। जिसमें हवा धूप और बरसाते सब अपने हर मौसम के अलग अलग रंग बिखेरते थे। खुले से आंगन में सुंदर सुंदर वृक्ष चितवन,सहतूत और लाल अमरूद का वृक्ष। जब यह अमरूद का वृक्ष फलों से लद जाता कारणवश उसकी डालियां झुक जाती तो मन उनके फलों का स्वाद चखने से अधिक नैनों को सुख पहुंचाता सा प्रतीत होता। इस सुन्दरता को और भी बढ़ाता आंगन में दोनों ओर लगे क्यारियों में बेला के फूलों का पौधा जिसकी हरी भरी शाखायें आपस में इस प्रकार जुड़ी सी प्रतीत होती मानों वह एक दुसरे के बांहों को जकडे़ कोई नृत्य करने को सजी हो। उनमें लगे सफेद फूलों का गुच्छा जिसकी सुन्दरता और खुशबू उस घर की सुन्दरता को और भी मनमोहक बना देते थे। गर्मी कि तपिस भरा दिन जितना भी ताप बढ़ा दे। किन्तु संध्या का आगमन होते होते वहां के वृक्ष और ठंड़ी हवा की पछुआ बयार जैसे पूरा वातावरण सितल कर देते थे। वहीं ठंड में कुहरे की चादर से झांकता सूर्य कि किरणों का वह गुनगुनापन हमें घंटों आंगन में ही बैठने पर मजबूर कर देता था। वह शाम भी कुछ ऐसी ही थी। कार्तिक मास का आगमन ठंड भी कुछ हल्की हल्की सी ही थी। और हम आंगन कि चारदीवारी के पास कोने में खडे़ सांझ के सूर्य कि लौटती अंतिम धूप की हल्की गर्माहट का आनन्द लेते हुए खडे़ थे। कि अचानक फूलों की क्यारियों की पत्तियां कुछ खडखड़ायी। हमने क्यारियों के नीचे झांका तो कुत्ते का नन्हा सा बच्चा उन सूखी पत्तियों को अपने पंजों से हटा हटा कर कुछ जगह बना रहा था। ठंड कि वजह से उसके शरीर के बाल रूई के गोले से गोल मटोल से हो गये थे।जब मैने उसे छुआ तो वह थरथरा कर सिकुड़ गया और अपने मुंह से कुछ कू कू की आवाजें निकालने लगा। फिर भी मैने उसे उन क्यारियों से निकाला। सुंदर भूरे रंग का मासूम सा वह मुझे इतना प्यारा लगा कि मैं कुछ पल उसके सार यूं ही खेलती रही। कभी हाथों में उठाकर कभी जमीन पर दौड़ाकर कुछ क्षण ऐसे ही करती रही। वैसे मेरी उम्र इतनी कम नहीं थी। मैं उस समय हाई स्कूल के बाद ग्यारहवी में दाखिला ले चुकी थी। फिर भी उसे देखकर मेरा मन बचपन के अटखेलियों में पहुंच गया था। शाम का अंधेरा जैसे जैसे हो रहा था वह नन्हा कुत्ता कुछ रोने जैसी आवाजें निकाल रहा था। मुझे आभास हुआ यह सच में बहुत छोटा है। और मेरे मन में खयाल आया कि इसे इसके मां के पास ही छोड़ देना ही उचित है। मुझे विश्वास था कि इसकी मां इधर उधर ही होगी कहीं चलो चल कर ढूंढ देते है। उस नन्हें बच्चे को लिए मैं काफी देर तक अपने घर के आस पास झांकती रही मगर कहीं भी उसकी मां नहीं दिखायी दी। काफी समय तक परेशान देखकर कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि आप इसे यही छोड़ दे। उसको पता होगा कि उसकी मां कहां है और वह स्वयं ही वहां पहुंच जायेगा। उन लोगों की बात मानते हुए मैंने उसे वही पास ही रास्ते में छोड़ कर वापस घर लौट आयी। और चारदीवारी के पास ही लगे कुर्सी से अपनी किताबें समेंटने लगी। तभी मुझे लगा पैरो को कोई गर्म सी चीज स्पर्श कर रही थी। चौककर मैने देखा वह नन्हा रूई के गोले जैसा कुत्ता मेरे पैरो को चाटे जा रहा था। मोहवश मैने उसे तुरन्त उठा लिया और घर के भीतर ले आयी। सबके मना करने के बावजूद कि घर में कुत्ता नहीं रखना है। फिर भी मैने सबसे वादा करके कि किसी को कोई परेशानी नही होगी। उसे साथ रखने के लिए मना लिये।

सुबह से शाम तक मेरी निगाहे उसी को देखती।नाम रख दिया भूरा। सुबह आंखे खुलने पर भी कुछ पल भूरा के साथ बच्चें बन जाते। स्कूल से लौटने के बाद भी भूरा से ही चुहलबाजी। भूरा अब प्रतिदिन कि दिनचर्या में शामिल हो गया था। भूरा की सारी जिम्मेदारी में भूरा को नहलाना ,उसका खाना ,उसको सुलाना भी मुझे अच्छा लगता था

 अब भूरा को भी जैसे मेरी आदत हो गयी थी। स्कूल से आने के बाद सबसे पहले भूरा को ही दुलारना होता था । गेट के बाहर से ही हल्की आहट से भूरा को आभास हो जाता था कि मैं शायद आ गयी और वह वही से भौकना शुरू कर देता था। गेट के पास देखने के बाद तो जैसे वह अपने पर नियन्त्रण ही नही रख पाता था। और कभी चेन के पट्टे को गले से छुड़ाने लगता कभी ऊंचा ऊंचा कूदने लगता। ये कहने पर कि आती हूं भूरा थोड़ा रूको तो।और जितनी देर मैं सायकिल से बैग और किताबे निकालती। वह बैठकर अपनी ही भाषा में जैसे ढे़रो शिकायते करता रहता। मेरे इतना कह देने भर से कि अच्छा किसी ने तुम्हे खाना नही खिलाया? जैसे वह समझ लेता और अपने आगे के दोनों पैरो को फैलाकर अपनी गर्दन उस पर रख कर कभी अपने खाने से भरे हुए बर्तन को देखता कभी मेरी तरफ देखता। मैं बिना स्कूल ड्रेस उतारे ही सबसे पहले उसे खिलाती। भूरा कि आदत बन गयी थी हाथों से खाना खाने की जो घर का कोई सदस्य नही करता मेरे अलावा। भूखा वह चाहे जितना भी रहे लेकिन खाना उसे हाथों से ही खाना होता था। नहाने के लिए भी भूरा मुझसे पहले ही आतुर रहता। वैसे तो कुत्तों का स्वभाव होता है कि वे पानी से दूर भागते है। लेकिन भूरा को नहाने का अजीब सा शौक था। जब भी मैं उसे नहलाने के लिए नल के पास ले जाती। वह आराम से फर्श पर बैठ जाता और जितनी बार उसके ऊपर पानी डालती वह अपनी आंखे मूद मूद कर एकदम से मासूम बना रहता।और नहलाने के बाद रोज कहती कि तुम उन क्यारियों के पास वाले बालू की ढे़र पर बिल्कुल मत जाना। तो भूरा मासूमियत से अपने दोनों कान आंखो के आगे लटका लेता और चुपचाप बैठा रहता। लेकिन जैसे ही मैं किसी कार्य के लिए इधर उधर होती। वह सरपट ही अपने भीगे बदन को बालू की ढे़र में लोट पोट कर एक मिट्टी से लदा हुआ बुत बन जाता। और जैसे मैं वापस आती तो उसकी इस हरकत से मुझे गुस्सा तो आता पर कुछ क्षणों में ही मेरे चेहरे पर एक हंसी की लहर दौड़ जाती। दिन प्रतिदिन भूरा बढ़ता जाता। भूरा का कद काठी काफी लम्बा चौड़ा सा दिखता था। देखने में लगता ही नही था कि कोई साधारण नस्ल का कुत्ता है। और अगर वह किसी के सामने गुर्रा दे तो निश्चित रूप से हर कोई डर कर पछाड़ खा जाता था। और लोग पूछ बैठते थे काटेगा तो नहीं बड़ा ही रोबिला कुत्ता है किस नस्ल का है। वैसे तो भूरा को चारदिवारी के अन्दर रोज ही खुला छोड़ देते थे। वह दौड़ कूद कर लेता था। फिर अचानक से मुझे लगा कि इसे भी थोड़ा बाहर में घूमने दे। मुझे लगा कि भूरा थोड़ा खुला रहेगा तो अच्छा रहेगा। वैसे भी भूरा खुला रहने पर भी इधर उधर नहीं जाता साथ ही टहलता और घर वापस आ जाता ।अंधेरा होने पर अगर कोई बाहर निकलता तो भूरा साथ साथ ही रहता भले ही किसी को किसी काम के लिए घंटो लग जाये वह साथ में ही आता। एक दिन तो वह मेरे पीछे पीछे स्कूल तक आ गया। और मुझे तब पता चला कि भूरा मेरे सायकिल की रप्तार के साथ साथ ही पीछे भागता आ रहा है। और जब बाहरी कुत्तों के तेज तेज भौकने की आवाज आयी तब हमने पलट कर देखा कि भूरा को कुछ बाहरी कुत्ते घेरे हुए थे। और भूरा बुरी तरह हांफ रहा था। मुझे डर था कि कही ये बाहरी कुत्ते भूरा को नुकसान न पहुंचायें। मै स्कूल न जाकर वापस लौटना चाहती थी। पर अब स्कूल भी पास था। मुझे। समझ नहीं आ रहा था मै क्या करू भूरा अकेले घर भी वापस नही लौट पायेगा। और मैं यह जानती थी कि मैं जब तक स्कूल से वापस नही आऊंगी भूरा गेट पर ही मेरा इंतजार करता रहेगा। यही सोचकर मैं स्कूल तक गयी भाग्यवश स्कूल पर किसी वजह से अवकाश का बोर्ड लटका दिखा। इसलिए मुझे वापस से लौटना पड़ा। और भूरा उसी रप्तार से मेरे सायकिल के पीछे भागता हुआ घर वापस लौटा।

एक दिन हमने भूरा को बाहर घूमने के लिए छोड़ा और देखते ही देखते उसने एक पंक्षी पर झपट्टा मार कर आहत कर दिया। काफी छोटा पंक्षी का बच्चा सा था वह और भूरा उसे निगलने लगा। उसके इस हरकत से खिझकर हमने उसके गले के पट्टे से ही दो तीन पट्टे खीचकर मार दिये। और वह वही लेट गया। मैने उसे लाख घर लाने कि कोशिश की पर वह घर वापस नही आया। गुस्से की वजह से मैने उसे वही छोड़ दिया और घर वापस लौट आयी। भूरा पूरी रात घर नही आया। कहां गया पता नही। ढूंढने पर भी नही मिला।फिर कुछ दिन बाद वह घर के बाहर गेट पर बैठा दिखा मैने उसे प्यार से सहलाने की कोशिश की तो वह दूर जाकर बैठ गया। खाने को देने पर भी वह कुछ नहीं खाया और गेट के भीतर तक नहीं आया। बाहर से ही फिर कहीं चला गया। मुझे बहुत दुःख था भूरा का। अब भूरा घर नही आता था। न जाने कहां रहता था किसी को नहीं मालूम। दिख भी जाता तो हम लोगों को देखकर रास्ता ही बदल लेता था। फिर तो भूरा घर के आस पास ही नही दिखता था। कहीं जैसे गायब सा हो गया । अब मै स्कूल की पढ़ाई पूरी कर चुकी थी और कांलेज में दाखिला ले चुकी थी। समय ऐसे ही गुजर रहा था। अब हम लोग वहां का घर छोड़कर कही और मकान लेने जा रहे थे।इसी बीच एक दिन अचानक से भूरा घर के अन्दर आया वह काफी चोटिल था। उसका कान बुरी तरह से सड़ चुका था। उसको उस स्थिति में देखकर घर के लोग उसे घर में दाखिल नहीं होने देते थे। मैने उसके दवा के बारे में सोचा। तब घर के लोगों ने कहा। उसका इलाज सम्भव नहीं है। वह अब ठीक नहीं हो पायेगा। और लोग उसके पास तक नहीं जाने देते थे। और मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पायी। और एक सुबह पता चला की भूरा मर गया। असहनिय पीड़ा हुआ मुझे। भूरा के जीवन का वह कालचक्र जो समाप्त हो गया कितना कम सा लगा। और अपना यह जीवन अत्यधिक लम्बा सा प्रतीत हुआ। भूरा आज भी जीवित है मेरी लेखनी में। हम वह घर छोड़कर चले आये । पर भूरा कि स्मृतियां अपने साथ ले आये।

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