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भारत में अंतरिक्ष शिक्षा में क्रान्ति की सम्भावनाएं खोजना ज़रूरी

नारायण भार्गव, फाउंडर एवं मैनेजिंग डायरेक्‍टर, नारायण भार्गव ग्रुप

मुंबई : भारत अमृत काल के दौर से गुजर रहा है, और इसे एक विकसित राष्ट्र में बदलने के लिए आने वाले 25 वर्ष बेहद महत्वपूर्ण होंगे। हमारे देश की अंतरिक्ष शक्ति (स्‍पेस पावर) इसके सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक साबित होगी। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम) से जुड़ी प्रतिभा, सस्‍ती टेक्‍नोलॉजी का विकास, अंतरिक्ष अभियानों और सहायक नीतियों के विशिष्ट संयोजन के साथ भारत विकास के लिए अपने अंतरिक्ष क्षेत्र का लाभ उठाने की अच्छी स्थिति में है। वर्ष 2035 तक अंतरिक्ष केंद्र (स्पेस स्टेशन) बनाने और 2040 तक चन्द्रमा पर एक भारतीय को उतारने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान से भारत के अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक नए युग की शुरुआत हुई है।

भारत की अन्तरिक्ष विरासत (स्‍पेस लेगेसी) प्रभावशाली है। इसने इस क्षेत्र में अनेक उपलब्धियाँ और अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा हासिल की है, जिसने हमारे युवाओं के मन में गर्व और आकांक्षाओं की भावना का संचार किया है। इस राष्ट्रीय गौरव का लाभ उठाने से भारत अंतरिक्ष शिक्षा के क्षेत्र में और आगे बढ़ सकता है। हाल में भारत के चंद्रयान 3 से सफल प्रक्षेपण को काफी वैश्विक सम्मान मिला है। यह उपलब्धि भारत की वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय यात्रा में एक महत्वपूर्ण क्षण को दर्शाती है जिससे अंतरिक्ष की खोज के क्षेत्र में देश की हैसियत उन्नत हुई है। चंद्रयान 3 की सफलता महज एक उपलब्धि से कहीं बढ़कर है। यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को आगे बढ़ाने, गहराई से अंतरिक्ष की खोज में एक प्रमुख स्थान प्राप्त करने और मानवता को एक अंतर-ग्रहीय सभ्यता बनने की दिशा में प्रेरित करने के प्रति इसकी अविचलित प्रतिबद्धता का प्रतिबिम्ब है।

अगला दशक सरकारी-निजी सहयोग, विकसित हो रहे स्टार्ट-अप परितंत्र और अंतरिक्ष के वाणिज्यीकरण तथा अंतरिक्ष की खोजों में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी के कारण अंतरिक्ष उद्योग को काफी मजबूती मिलेगी। शैक्षणिक समुदाय-उद्योग-सरकार नए-नए सहभागिता मॉडलों के साथ आधिकाधिक सहयोग आरम्भ करेंगे। देश का अंतरिक्ष विनियामक संगठन, इंडियन स्‍पेस प्रमोशन एंड ऑथेराइजेशन सेंटर (इन-स्‍पेस) के अनुमान के अनुसार, भारतीय अंतरिक्ष अर्थव्‍यवस्‍था लगभग 44 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। इसके अलावा अगले दशक में 11 बिलियन डॉलर का निर्यात अपेक्षित है और इस प्रकार वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग में इसकी हिस्सेदारी मौजूदा 2 प्रतिशत से बढ़कर 8 प्रतिशत हो जायेगी। इस वृद्धि के लिए वैज्ञानिकों, इंजिनियरों, खगोलविदों, अंतरिक्ष यात्रियों, अंतरिक्ष-भौतिकविदों, और अन्तरिक्ष उद्यमियों सहित लाखों बेहद कुशल प्रोफेशनल्स की ज़रुरत होगी जिससे कि भारतीय अंतरिक्ष उद्योग का दायरा विस्तारित हो सके।

लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि भारतीय स्कूलों में अभी युवा प्रतिभाओं के अनुसार विशेष रूप से तैयार अंतरिक्ष शिक्षा के पाठ्यक्रम का अभाव है। भारतीय स्कूलों में अंतरिक्ष शिक्षा की क्रान्ति की तत्काल ज़रुरत है। अंतरिक्ष शिक्षा न केवल वैज्ञानिकों और इंजिनियरों की अगली पीढ़ी को विकसित करने के लिए, बल्कि आलोचनात्मक चिंतन, बहु-विषयक सहयोग, प्रयोग-अभिमुख मानसिकता, वैश्विक दृष्टिकोण की भावना भरने और ब्रह्माण्ड में हमारे ग्रह के स्थान की गहरी समझ के लिए भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। अंतरिक्ष की खोज में भारत के समृद्ध इतिहास को देखते हुए हमारे देश के सामने शिक्षा का भविष्य तैयार करने के लिए इस क्षेत्र में जुनून और जिज्ञासा का लाभ उठाने का अनूठा अवसर है।

अंतरिक्ष शिक्षा का महत्व शिक्षण के अधिकतम परिणामों के लिए कार्यकलाप-आधारित अनुभवजन्य शिक्षा प्रदान करते हुए, परम्परागत क्लासरूम और टेक्स्टबुक्स से आगे तक विस्तारित है। लगातार बढ़ रही टेक्‍नोलॉजी की प्रमुखता के युग में अंतरिक्ष शिक्षा आधुनिक वर्कफोर्स के लिए आवश्यक बहुमूल्य कौशल का विकास करती है। समस्या-समाधान, नवाचार, टीमवर्क, और अनुकूलनशीलता उन प्रमुख गुणों में शामिल हैं, जो अंतरिक्ष शिक्षा द्वारा पोषित होते हैं। इसके अलावा, यह स्वीकार करनी ज़रूरी है कि अंतरिक्ष शिक्षा स्टूडेंट्स को समुद्र विज्ञान, भूगर्भशास्त्र, गहरे अंतरिक्ष अभियानों, वाणिज्यिक एलईओ (न्यून पृथ्वी कक्षा) उपग्रह, पदार्थ विज्ञान, अंतरिक्ष पर्यटन, आदि के व्यापक क्षेत्र के लिए प्रासंगिक ज्ञान और कौशल से लैस करती है। अंतरिक्ष शिक्षा से पृथ्वी की भंगुरता और अंतरिक्ष की खोज में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व के बारे में ज्ञान के द्वारा एक वैश्विक दृष्टिकोण को भी बढ़ावा मिलता है। एक लगातार अधिक परस्पर सम्बद्ध और परस्पर आश्रित विश्व में वैश्विक संदर्भ की समझ महत्वपूर्ण है और अंतरिक्ष शिक्षा निश्चित रूप से यह दृष्टिकोण प्रदान करती है। वे स्टूडेंट्स, जो अंतरिक्ष विज्ञान और खोज को समझ लेते हैं, उनके पृथ्वी पर सभी जीवन प्रणालियों की परस्पर संबद्धताओं से अवगत वैश्विक नागरिक बनने की संभावना अधिक होती है। इसलिए, एक दीर्घकालीन अंतरिक्ष शिक्षा पाठ्यक्रम विकसित करना, स्टूडेंट्स के लिए कॅरियर की राह तैयार करने के लिए ज़रूरी है।

हमारे अंतरिक्ष अभियानों की सफलता में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की प्रमुख भूमिका रही है। यह संगठन अंतरिक्ष शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए स्कूलों और कॉलेजों के साथ सक्रिय रूप से काम करता रहा है। आईआईआरएस-इसरो आउटरीच प्रोग्राम ऑनलाइन शिक्षण प्लैटफॉर्म्स का प्रयोग करके अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और इसके प्रयोगों में शैक्षणिक समुदाय तथा प्रयोगकर्ता वर्गों को मजबूत बनाने पर ध्यान देता है।

अब भारतीय शिक्षा परितंत्र के लिए 7वीं कक्षा और उससे आगे के अपने पाठ्यक्रम में अंतरिक्ष शिक्षा को अग्रसक्रिय रूप में लागू करना अनिवार्य हो गया है। साथ ही, भारत के अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी क्षेत्र में संभावित निवेशक और निजी कंपनियाँ शैक्षणिक पहलों को सपोर्ट करने के लिए कदम बढ़ा सकती हैं। सरकार, निजी कंपनियों, और इसरो जैसे अन्तरिक्ष संगठनों को अंतरिक्ष शिक्षा को सपोर्ट करने वाले दीर्घकालीन पाठ्यक्रम, छात्रवृत्तियाँ और पहलकदमी का निर्माण करने के लिए मिल-जुलकर काम करना चाहिए।

इसके अलावा, कॉर्पोरेट सीएसआर फंडिंग में यह ताकत है कि वह भारत में अंतरिक्ष शिक्षा में काफी तेजी ला सकती है। कॉर्पोरेट सीएसआर फंड्स का आवंटन करके और गठबंधन बनाकर, भारत आगामी पीढ़ी को प्रेरित कर सकता है। इसके अलावा, अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने के साथ ही नवाचार तथा आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा दे सकता है।

अंतरिक्ष शिक्षा में नेतृत्‍व करने के लिए भारत के पास शानदार अवसर है। हम वैश्विक समस्याओं को हल करने और कई ट्रिलियन डॉलर की वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में योगदान करते हुए विज्ञान और प्रौद्योगिकी की सीमाओं का विस्तार करने में सक्षम बेहद कुशल वर्कफोर्स को तैयार कर सकते है।

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