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शोध समस्या बनाम शोधार्थी समस्या

– प्रवीण वशिष्ठ

गाँव के प्राइमरी स्कूल से चलकर विश्वविद्यालय की सीढ़ी तक के सफर के एक पड़ाव का नाम पीएचडी है। विद्यार्थी अध्ययन के दो ही पड़ाव पर कुछ सिखाता है और कुछ भूलता है। पहले प्राइमरी स्तर पर और दूसरे पीएचडी के स्तर पर। लेकिन विद्यार्थी जितना बड़ा झूठा प्राइमरी लेवल पर होता है उससे कहीं ज्यादे वह होशियार झूठा पीएचडी के स्तर पर होता है। इन्हीं कूविख्यात कुकर्मों के कारण ही शोध में प्लेगरिज्म जैसी तकनीकी का अविष्कार हुआ। हर साल भारत के विश्वविद्यालयों में सामाजिक विज्ञान में हजारों शोध हो रहें हैं। फिर भी इसका प्रभाव समाज पर नहीं दिखाई देता है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो सामाजिक विज्ञान की पृष्ठभूमि से किसी नए अविष्कार की अपेक्षा सरकार भी छोड़ चुकी है। क्योंकि आज के समय में पार्टियों के अध्यक्ष सबसे बड़े राजनीतिज्ञ, पार्टियों के बड़े चेहरे लुक से सबसे बड़े दार्शनिक और पार्टियों के प्रवक्ता देश के सबसे बड़े इतिहासकार बन बैठे हैं। और इस चलचित्र के डायरेक्टर की भूमिका में हमारी प्रिय निरपेक्ष डिजिटल मीडिया बन्धु के लोग हैं। शोध और आर्टिकल केवल नौकरी का माध्यम बन कर रह गया है। मजे की बात यह है कि समाज भी मीडिया व फिल्मों के माध्यम से इतिहास व राजनीति को देख रहा है। अनुसंधान व समाज के जुड़ाव का तादाम्य बनाने में भारतीय शिक्षा व्यवस्था सही मायने में असफल है।

एकेडमिक दुनियां में शोध हर विद्यार्थी का परम् लक्ष्य होता है। शोध वही जो समस्या से परिकल्पना, परिकल्पना से उद्देश्य और उद्देश्य से निष्कर्ष की तरफ सतत प्रवाहमान होता है। लेकिन शोध की समस्या एक जटिक समस्या है, जो शोध समस्या से कई मायने में गंभीर है। शोधार्थी के जीवन में शोध के अतितिक्त कई प्रकार की शोध समस्याएं होती हैं जिसके तीन प्रमुख चरण होते हैं। पहला, पीएचडी तक आते-आते विद्यार्थी का उम्र इतना हो जाता है कि परिवार वाले भी उसके साथ एक और परिवार जोड़ ही देते हैं। अब इस स्थिति में वह पीएचडी भले न लिख पाये लेकिन महीने का हिसाब लिखना तो वह सिख ही जाता है। वह एक साथ दो शोध समस्याओं में उलझा हुआ है, पहला, पीएचडी की शोध समस्या और दूसरा शोध के दौरान की समस्या। फिर भी शोधार्थी घिसापिटा किसी तरह निष्कर्ष तक पहुँच ही जाता है। लेकिन दूसरी स्थिति इसके एकदम विपरीत है। अगर पीएचडी होने तक विवाह नहीं हुआ तो समझिए की शोधार्थी का शोध परिकल्पना ही गलत थी। उसे यह समझने में भूल हो गयी की पीएचडी का तो निष्कर्ष कहीं न कहीं से निकल ही जायेगा लेकिन पीएचडी के बाद नौकरी नहीं मिली तो दाम्पत्य का शुखमय प्रमाद की जो उसकी सम्भावित परिकल्पना थी वह नल हो जायेगी। अब बारी है तीसरी स्थिति की जो और भी विकट है। पीएचडी के दौरान अगर शोधार्थी भूल-चुक से अपनी मेथडोलॉजी में परिवर्तन करते हुए किसी से प्यार कर बैठा तो स्पष्ट समझिए की उसका निष्कर्ष परिकल्पना के एकदम विपरीत होने वाला है। विभाग से होस्टल और होस्टल से लाइब्रेरी भले कितना भी कर ले फिर भी उसको कहीं भी रिशर्च गैप नहीं दिखायी देगा। सोते-उठते, खाते-पीते और पढ़ते हुए लाचार शोधार्थी की निष्कर्ष अंत में यही होगा कि उसे पहले वाला मेथडोलॉजी नहीं बदलनी चाहिए थी। पीएचडी तक आते-आते शोधार्थी अगर बला और कला या हुनर और होशियारी में फर्क नहीं कर पाया तो समझिए सारे फैक्ट कलेक्ट करने के बाद भी आपकी फाइंडिंग गलत है।

पीएचडी उम्र का एक ऐसा पड़ाव है जिसमें शोध के चरण के अतिरिक्त आप भी उम्र के कई चरण से गुजर चुके होते हैं। इस उम्र तक शोधार्थी के अंदर यादों की एक समझदार अभिलेखगार स्थापित हो चुका होता है, और उसके कमरे में खुद का एक सुंदर संग्रहालय भी होता है। संग्रहालय में कई यादगार स्मृतियों के साथ -साथ उपलब्धियों और सफलताओं के प्रतीक भी सुरक्षित होते हैं। पीएचडी तक किसी को प्यार नहीं हो सकता ऐसी मान्यता है और अगर हो रहा है तो समझिए की वह प्रेम संभावित है और उसकी अनुक्रिया का निष्कर्ष कभी भी बदल सकता है। एक मित्र हमारे पीएचडी के साथ-साथ पढ़ाते भी थे। उन्हें एम.ए की एक लड़की पसंद आई । अब उनकी शोधार्थी नैतिकता उन्हें कुछ कहने को नहीं कह रहा था। बहुत समस्या में एकदिन उनसे बात हुई। मैंने उनसे पूछा, मान्यवर आपका प्रेम सापेक्ष तो है ना? तो उनका जवाब था कि मित्र प्राथमिक स्रोतों की मानें तो लड़की को मैं पसन्द तो हूँ लेकिन द्वितीयक स्रोत ठीक इसके विपरीत तथ्य देते हैं। मैंने पूछा वो क्या तथ्य देते हैं ? तो उन्होंने बताया कि लड़की एक बूक में पढ़ी है कि शोधार्थी रोमांटिक नहीं होते इसलिए वो थोड़ा डर रही है। बात बड़ा अजीब सी थी। प्रोफेसर बनने पर वही शोधार्थी रोमांटिक हो सकता है, जबकि पीएचडी के दौरान वह सो काल बोरिंग टाइप का व्यक्ति है। सच में पीएचडी एक अद्भुत दौर होता है। इस दौर में शोधार्थी समस्या से निष्कर्ष की ओर अग्रसर न होकर बल्कि जीवन में कई निष्कर्षों से समस्याओं की ओर उन्मुक्त होता है।

इस शोध रूपी संघर्ष की शुरुआत जिस भव्य परास्थापत्य इमारत से होती है वह विश्वविद्यालय, कालेज या तकनीकी संस्थान कहलाते हैं। सबका अपना अलग विभाग, इकाई या अलग संस्था होती हैं। मास्टर्स करने के बाद छात्र जब क्लास रूम से चेम्बर रूम तक पहुंचता है तो विभागीय दुनिया का स्वर्णिम स्वप्न अचानक से टूट जाता है। तब उसे समझ आता है कि पीएचडी में एडमिशन लेने के लिए उसे उतनी ही मसक्कत करनी पड़ती है जितना एम.एल.ए को टिकल लेने के लिए करनी पड़ती है। प्रक्रिया वही है। अगर दावँ-पेच में समीकरण ठीक से नहीं बैठाए तो प्रक्रिया से बाहर हो सकते हैं। राजनीति में जैसे पार्टीयों की अपनी विचारधारा होती है वैसे ही विभागों में विचारधाराओं की लॉबी है। राष्ट्रवादी, समाजवादी, मार्क्सवादी और दलित चिंतन के पेशकार आपको यहाँ मिल जाएंगे। अच्छा! मजे की बात यह है कि यहाँ जातियों की लॉबी भी माईने रखती है। सवर्ण ग्रुप , ओबीसी ग्रुप और एसटीएससी ग्रुप , यहाँ सब तरह के लोग हैं। कल तक जो छात्र मास्टर्स में सामाजिक समरसता का पाठ एक साथ बैठ कर पढ़ रहा था वही विद्यार्थी पीएचडी के लिए जाति समीकरण ढूढ़ते नजर आएगा। एडमिशन के लिए एक और विचारधारा की लॉबी है। जिसका वर्ग भी हमेशा से विश्वविद्यालय में रहा है। कम शब्दों में कहें तो वह विचारधारा रसिकवाद है। यह सब सिंद्धान्तों से परे है। कण्व ऋषि ने सब रसों में सबसे आध्यात्मिक रस सोम रस को बताया है। उसी प्रकार इस पंथ के लोग भोगरस में विश्वास रखते हैं। यहाँ सम्बन्ध का बस एक ही आधार है आदान- प्रदान। इस श्रेणी में रूपजीवक और रूपाजीवा टाइप के बौद्धिक जन सम्मलित होते हैं। ये बड़े रेशनल लोग होते हैं जिनका किसी जाति, मत, विचार से कोई भेदभाव नहीं होता है। इस विचारधारा में सम्मलित होने के लिए परम स्वार्थी होने के साथ-साथ तथाकथिक चरित्रवान होना ही काफी है।

पीएचडी जिसके साथ किया जाता है उसे शोध पर्यवेक्षक यानी सुपरवाइजर या भारतीय परम्परा में कहें तो गुरु कहा जाता है। जो शोधार्थी इस बात को नहीं समझता वह भूल कर रहा है कि वो आपके सुपरवाइजर इसलिए नहीं हैं कि आपने उनका चयन किया बल्कि वो आपके सुपरवाइजर इस लिए हैं ताकि उन्होंने आपको चुना। एक समय था जब शोधार्थी यह समझता था कि उनका गुरु ही उनका सबकुछ है। इस परिपाटी के लोग अब कम मिलेंगे। अब सुपरवाइजर व शोधार्थी के बीच का सम्बंध आजीवन होने की बजाए अनुबंधित हो चुका है। गुरु अगर बालू से शिप निकालने की जद्दोजहद कर रहा है तो आपको भी रेत में हाँथ आजमाना होगा। यह वहाँ माईने नहीं रखता की आप समुंद्र में गोता लगाना चाहते हैं। समस्या यहाँ तक नहीं है, समस्या तो इसमें होता है कि अगला शिप ढूढ़ने लायक है की नहीं यह समझना चाहिए। सर्वेक्षक को सर्वेक्षक होना चाहिए शोधार्थी के आचरण, परिस्थिति, अध्ययन क्षमता और व्यवहार के प्रति। सर्वेक्षक सच में समझ सकता है कि सही में शोधार्थी शोध समस्या में उलझा है कि शोध के साथ के समस्या में। यह बात आपके अतिरिक्त आपका सर्वेक्षक ही समझ सकता है। शोधार्थी को भी समर्पण भाव से गुरु का सम्मान करना चाहिए। इसके विपरीत अगर शोधार्थी या सुपरवाइजर के बीच यह तादाम्य नहीं तो दोनों को एक दूसरे का परित्याग कर देना चाहिए।

विभागीय प्रक्रिया भी एक उपादान है। विभाग में पीएचडी करना व कराना दोनों कठिन काम है। पूरे प्रक्रिया की चाभी हमेशा बदलती रहती है। कभी फला हेड है तो कभी फला डीन। कभी इस चेम्बर तो कभी उस चेम्बर में। इन सबके निकास का केवल एक ही द्वार है जो कार्यालय से होकर गुजरता है। इस द्वार के आगमन व निकास के मार्ग में जैसे मंदिर के प्रवेश द्वार के बाहर भगवान गणेश बैठे होते हैं वैसे कार्यालय के बाबू बैठे रहते हैं । कार्यालय के पास इतनी छमता है कि वो विद्यार्थी तो दूर वह चाहे तो प्रोफेसर को भी नालायक घोषित कर सकता है। अगर कोई आजमाना चाहे तो किसी बाबू से उलझ कर देखें। उनके सारे नियम उल्टे होते हैं। कब कहाँ कौन सा नियम लगाना है वह आपके व्यवहार व चाटूकारिता पर निर्भर करता है। इसी लिए पीएचडी जमा करने से पहले मंदिर के गणेश भगवान की तरह सबसे पहली मिठाई का भोग बाबू व क्लर्क लोगों को ही लगाया जाता है। ध्यान रहे जहाँ व्यवस्था ज्यादे खूबसूरत हो वहाँ मिठाई के साथ मोटी रकम भी वैकल्पिक रूप से जुड़ जाता है।

 पीएचडी समीक्षा व समस्या का अंत वहाँ होता है जब पीएचडी एकेडमिक सेक्सशन में जमा हो जाता है। मुझे याद है मैं जिस विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था अचानक वहाँ एक सूचना जारी हुई की छः साल से ऊपर के शोधार्थियों को एक्सटेंशन नहीं दिया जाएगा वो यथासंभव पीएचडी जल्द से जल्द जमा करें। सौभाग्य से मैं सूचना के अंतिम तिथि पर सेंट्रल आफिस गया था। वहाँ प्रत्येक बीस मिनट पर एक पीएचडी वैसे ही आ रही थी जैसे मणिकर्णिका घाट पर हर बीस मिनट पर एक मुर्दा! और शोधार्थी के साथ कुछ दोस्त यार सहज विजय की भावना लिए आगे बढ़ रहे थे। जमा करने वाले शोधार्थी के चेहरे पर अकादमिक मोक्ष्य का भाव विश्वविद्यालय छोड़ने के करुणा के साथ साफ दिखाई दे रहा था, मानो विश्वविद्यालय छूटा या नहीं पर पीएचडी से जान तो छूट ही गया।

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