Khula Sach
अन्यताज़ा खबर

कविता : तुम घरो में महफ़ूज़ रहना, तों ही हम सीमा पे महफ़ूज़ है

फौजी की कलम से 

– सतीश ढाका

मेरी या तेरी नहीं हम सब की है,
यें जीत-हार भी हम सब की है।

गुजर रही है जिंदगी ऐसे मुकाम से,
अपने भी दूर हो जाते है जरा से जुकाम से।

तमाम कायनात में एक कातिल बीमारी की हवा हो गई,
वक्त ने कैसा सितम ढहाया कि दूरियां दवा हो गई।

आज रहे अगर सलामत तो कल की सहर देखेंगे,
आज पेहरे में रहे तों कल का पहर देखेंगे।

साँसो के चलने के लिए कदमों का रुकना जरूरी है,
घरों में बंद रहना हालातों की मजबूरी है।

मेरी या तेरी नहीं हम सब की है,
यें जीत-हार भी हम सब की है।

अपने लिए नहीं अपनों के लिए जीना है,
ये जुदाई का जहर घुट-घुट के पीना है।

आज महफूज रहे तो कल मिल के खिल-खिलाएँगे,
गले भी मिलेंगे और हाथ भी मिलाएँगे।

मेरी या तेरी नहीं हम सब की है,
यें जीत-हार भी हम सब की है।

Related posts

सुरक्षित परिवहन के लिए जूमकार की पहल

Khula Sach

Mumbai : अदानी इलेक्टिसिटी के बिल रिकवरी डिपार्टमेंट के बंदे ने की ग्राहक से बदतमीजी और बाद में मांगे पैसे

Khula Sach

Daily almanac & Daily Horoscope : आज का पंचांग व दैनिक राशिफल और ग्रहों की चाल – 7 फरवरी 2021

Khula Sach

Leave a Comment