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माँ की ममता : मैं मंदिर भला क्यूँ जाऊं !

“श्रीयम न्यूज़ नेटवर्क” द्वारा आयोजित प्रतियोगिता “माँ की ममता” के काव्य वर्ग में  प्रथम स्थान प्राप्त कविता 

  • अंजू जांगिड़”राधे”

में मंदिर भला क्यूँ जाऊं
अपनी माँ के चरणों मे स्वर्ग पाऊं।।

जब भी त्यौहार पर माँ संवरती है
जगदम्बा की मूरत सी वो लगती है।।

जब भी होठों पर झूठी मुस्कान होती है
कैसे उसे छिपे हुए दर्द की पहचान होती है ।।

दोस्तों माँ के आशीर्वाद में बहुत जान होती है
हमें सूखे में सुला खुद गीले में सोती है।।

अपने खून से हमें सींच कर बड़ा करती है
परेशानियों को सिर में हाथ रख दूर करती है।।

माँ घर की ममतामयी छांव सी होती है
बरगद के वृक्ष की ठंडी छांव सी होती है।।

अपने दुःखो को हमसे छिपाती है
आज भी खाना लेकर पीछे भागती है।।

खुद के सपनो को कुचल कर मुस्कुराती है
घर को माँ मंदिर की तरह सजाती है।।

क्या हम माँ के दर्द को पहचान पाते है
नहीं बस अपने सुख में ही व्यस्त हो जाते है।।

एक स्त्री होकर कितने रूप वह निभाती है
बेटी बहन भाभी साँस माँ कितना सह जाती है।।

खुद जब में माँ बनी तब इस दर्द को पहचान पाई
कैसे माँ कैसे तूने इतनी दर्द भरी पीड़ा छिपाई ।।

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