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Mirzapur : साहित्यकार समाज को सार्थक दिशा देता है : अविनाश राय, सहायक आयुक्त, व्यापारकर

ख़ुश्बू बिखेरती किताब का हुआ लोकार्पण

रिपोर्ट : सलिल पांडेय

मीरजापुर, (उ.प्र.) : भारतीय अदब की दो बहनों हिंदी और उर्दू को को बड़े अदब के साथ ग़ज़लों एवं नज़्मों के मजमुआ (संग्रह) ख़ुश्बू किताब में स्थान देने पर पूर्व सहायक वाणिज्यकर अधिकारी ज़नाब हसन जौनपुरी की ज़िले के नामचीन साहित्यकारों ने तारीफ़ की।

रविवार, 14 मार्च को नगर के ख़ास जलसा-स्थल पर इस किताब को आमोअवाम के लिए मुहैया (लोकार्पित) करते हुए सहायक व्यापार कर अधिकारी अविनाश चन्द्र राय पूरे टाइम बैठकर अदीबों की हौसला आफ़जाई कर रहे थे। पहले दो घण्टे अतिथियों का ख़ैर-मक़दम, किताब की ख़ासियतों को लेकर स्पीच (बयाँ) हुए जबकि अगले दो घण्टे शायरी और कविताई की ख़ुश्बू फैलती रही।

हसन की ‘ख़ुश्बू’

इस ‘ख़ुश्बू’ किताब के पहले भाग में 110 पेज तो हिंदी को भेंट किया गया है और 113 पेज उर्दू की शायरी को स्थान मिला है। अपनी बात में हसन एक इंसान नहीं बल्कि समंदर के रूप में नज़र आए । साहित्यकारों की अपनी-अपनी दरिया और अपने-अपने पोखरे, कुएं एवं तालाब हैं, सब अपनी सीमाओं को तोड़ यहां आकर मिल गए हैं। सभी समंदर किनारे खड़े दिख रहे है। हर छोटे-बड़े साहित्यिक फ़नकारों के प्रति ‘अपनी बात’ पेज पर एहसान नवाज़ा है हसन जौनपुरी ने।

संकलन के शुरुआती पन्नों में सभी धर्मों का निचोड़ 20वें पेज पर लिखे हम्द, नात, क़सीदा शब्द के माकूल है। सभी धर्म-पंथ के लोग ‘माता और मातृभूमि के लिए बलि-बलि हो जाने’ की जो बात करते हैं, उसे शायर हसन ने मुझे अज़ीज़ है हिंदुस्तान की ख़ुश्बू में कह दिया है। 21वीं सदी में दोस्ती में बढ़ती दग़ाबाज़ी के खिलाफ़ आंदोलन चलाता दिख रहा है मजमुआ तो बदलते दौर में ग़ज़लों को हुस्नो इश्क़ की बारात से आगे ले चलने की वकालत की गई है।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव.. भाव में शायर जब आए तो सभी बागडोर तू हफ़ीज है, तू रहीम है तेरी शान शाने अज़ीम है..’ लाइनों से व्यक्त करते हैं। शायर का विविध रूप संकलन में दिखा। मसलन पर्यावरण बढ़िया बनाने के लिए गंगा-जल की निर्मलता की भी अपील उन्होंने की है।

पुस्तक में उर्दू के सरल शब्दों का प्रयोग किया गया है लेकिन यदि हिंदी सेक्शन में उर्दू के शब्दों का नीचे पंक्ति में हिंदी अर्थ लिख गया होता तो यह डिक्शनरी बन जाती है। प्रिंटिंग शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया गया है। एकाध त्रुटि ही दिखाई पड़ी। क़िताब समय के साथ विविध रूपों में तालमेल कर रही है। वर्ष ’21 में छपी किताब में शायरी की शुरुआत ही पेज नम्बर 21 है। लब्बोलुबाब किताब बेजोड़ है। लोकार्पण समारोह की सदारत बजुर्ग शायर ताबिश इकराम तो संचालन राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में बतौर कवि/गीतकार और समालोचक छप रहे अरविंद अवस्थी ने किया। किताब की विस्तृत समीक्षा हिंदी साहित्य के इनसाइक्लोपीडिया वृजदेव पांडेय ने की। काव्यात्मक जलसे में दो दर्जन से अधिक कवि और शायर मौजूद रहे।

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