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Chattarpur : नृत्य समारोह की चौथी शाम ओडीसी युगल, सत्रीया समूह, और कत्थक के नाम रही 

धार्मिक प्रसंगओ ने लोगों का यह ध्यान आकर्षित

रिपोर्ट : निर्णय तिवारी

छतरपुर, (म.प्र.) : खजुराहो नृत्य समारोह की शाम कंदारिया महादेव व जगदंबी मंदिर के आंगन में सज रही है। कंदारिया महादेव मंदिर पश्चिम समूह के मंदिरों में विशालतम हैंं। संधार प्रसाद शैली में निर्मित यह मंदिर अपनी भव्यता और संगीत मेहता के कारण प्रसिद्ध हैै। इस विशाल मंदिर का निर्माण चंदेल राजाओ के द्वारा महमूद गजनबी पर अपनी विजय के उपलक्ष में करवाया था। लगभग 1100 ईस्वी में बनवाए गए।

खजुराहो नृत्य महोत्सव की चौथे दिवस मंदिर प्रांगण में शाम 7:00 बजे आयोजित होने वाले नृत्य महोत्सव में प्रथम प्रस्तुति विनोद केविन बच्चन एवं वृंदा चड्ढा उड़ीसी युगल नृत्य की रही बिंद्रा चड्ढा गत 18 वर्षों से गुरु रजनी गौहर के सानिध्य में थोड़ी सी कला क्षेत्र में कार्यरत है आपने लेडी श्री राम कॉलेज दिल्ली से दर्शन शास्त्र में उपाधि मिली है और साथी ओडीसी नृत्य के लिए संस्कृति मंत्रालय की राष्ट्रीय छात्रवृत्ति भी प्राप्त की है सर्वप्रथम अर्धनारीश्वर रूप तांडव स्वरूप के एकाकार होने की कहानी ताल, राग, मालिका में नृत्य ने लोगो को आश्चर्य में डाल दिया।

ओडिसी नृत्य की दूसरी प्रस्तुति भगवान विष्णु को समर्पित रही। हिंदू धर्म में ईश्वर के अवतारों की सदा ही मान्यता रही है। जब जब धरती पर पाप बढ़ता है ईश्वर अवतार लेते हैं और दुष्टों का संहार करते हैं भगवान श्री हरि विष्णु धर्म की रक्षा हेतु हर काल में अवतार लिया और यही अवतार दशावतार के नाम से प्रसिद्ध हैं। आज इन्हीं अवतारों को श्री जयदेव द्वारा रचित रचना के माध्यम से दर्शाया गया। आपने अपने गुरु के सानिध्य में भारत सहित विदेश में अपनी उड़ीसी नृत्य की प्रस्तुतियों हेतु कई देशों की यात्रा की आपने अपने गुरु के साथ विभिन्न नृत्य नाटिकाओं में मुख्य स्त्री पात्र की भूमिका निभाई है। वृंदा को नालंदा नृत्य निपुण पुरस्कार और भुवनेश्वर का ओडीसी रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

तो वही नृत्य महोत्सव में दूसरी प्रस्तुति असम के सत्रिया की सिद्धहस्त कलाकार अनीता शर्मा एवं साथी समूह की रही। जिसमें सर्वप्रथम नृत्य प्रस्तुति कृष्ण वंदना से की गई। जिसमे भावों और हाथों के इशारों के माध्यम से कृष्ण के उपाख्यानों का वर्णन करते हुए, कृष्ण वंदना में भगवान कृष्ण की सुंदरता का वर्णन किया गया है। जिनके पैर कमल के मणि के समान हैं और आंखें सुंदर कृष्ण की ताजा पंखुड़ियों जैसी हैं। पीले और आभूषणों से सजे हुए पूरे मोने के रूप में शानदार है। भगवान शिव सहित स्वर्ग के देवता भी कृष्ण के सामने सिर झुकाकर प्रसन्न होते हैं और उन्हें पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। को नृत्य के जरिए परिभाषित किया और स्थानों के तालमेल ने लोगों को खूब ध्यान आकर्षित और तालियां बटोरी।

प्रिया श्रीवास्तव के कत्थक की तीसरी प्रस्तुति शिव को समर्पित रही नृत्य प्रस्तुति में भगवान शिव और मां पार्वती के शुभ विवाह का चित्रण किया गया। भगवान शिव अंगों में भस्म रमाए गले में सर्प लिफ्ट आए एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरु लिए जटा खोलकर नदी नंदी पर सवार है। उनके बाराती भूत प्रेत पिशाच आदि अद्भुत नृत्य कर रहे हैं। जिसे देखकर पार्वती की मां मैना रानी डर जाती हैं और कहती हैं गोरे सलोनी तोर नैना जिसमें पार्वती के सुंदर श्रृंगार और नव रसों का वर्णन से अचंभित रह गए और नृत्य में हुए नजर आए।

आप बिलासपुर छत्तीसगढ़ के निवासी हैं और आपने इंदिरा कला संगीत विद्यालय से कथक नृत्य में बीए एमए और पीएचडी किया आपकी गुरु इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय की अध्यक्षा डॉ ज्योति बक्षी जी हैं शिक्षण काल में ही उच्च प्रतिभा के सम्मान में दो स्वर्ण पदक प्राप्त करने का गौरव प्राप्त हुआ आप दूरदर्शन की ए श्रेणी की कलाकार हैं आपको छत्तीसगढ़ कला अस्मिता पुरस्कार एवं भारतीय दलित साहित्य अकादमी का सम्मान से सम्मानित किया गया आपको नालंदा महोत्सव बिहार में किया प्रदर्शन से कीर्ति प्राप्त हुई और 2012 में रिटर्न रंग अकादमी धमतरी में नृत्य प्रदर्शन ने दर्शकों के बीच जगह बनाई आपने चक्रधर समारोह महाराणा कुंभा महोत्सव राजस्थान और कालिदास समारोह नागपुर भाव उज्जैन में प्रभावशाली नेतृत्व में प्रदर्शन किया।

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