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नशे में युवा पीढ़ी, दांव पर लग रही भारतीय संस्कृति

पूजा गुप्ता, मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)

वर्तमान परिदृश्य में समाज को देखें तो पता चलता है कि युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति को दिन-प्रतिदिन पीछे छोड़कर आगे आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल होती जा रही है। संस्कृति-संस्कार ऐसे अभिन्न अंग हैं जिनसे समाज तय होता है। कहा जाता है कि जिस प्रकार की संस्कृति व संस्कार किसी समाज में प्रचलित होंगे, उसी स्तर का समाज सभ्य माना जाता है। हमारे देश-प्रदेश की संस्कृति व संस्कार वैश्विक मंच पर आदर्श स्थान पर रहे हैं। भारतीय जीवनशैली को विश्व में सबसे श्रेष्ठ व सभ्य माना जाता रहा है। लेकिन समय के चक्र व पाश्चात्य प्रभाव ने कई संस्कृतियों के संस्कारों को उधेड़ कर रख दिया।

आज अधिकांश लोग संस्कृति व संस्कारों के साथ जीने को पिछड़ापन मानते हैं, लेकिन पिछड़े हुए तो उन्हें कहा जा सकता है जो अपनी संस्कृति व संस्कारों से छिटक कर अपना पाश्चात्यकरण कर चुके हैं। भारत की संस्कृति व सभ्यता का तर्क व वैज्ञानिक आधार रहा है, जिसने पूरे विश्व को जीवन मार्ग पर चलना सिखाया, तभी भारत को ‘विश्व गुरु’ जैसी उपमाओं से अलंकृत किया जाता रहा है। लेकिन वर्तमान में समाज का अधिकांश वर्ग आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी संस्कृति व संस्कारों को भुला चुका है। माता-पिता को सम्मान देने की बजाय उन्हें वृद्धाश्रमों में जीवन काटने के लिए या यूं कहें कि मौत के इंतजार के लिए छोड़ दिया जाता है। जिन माता-पिता ने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपना जीवन कष्टों में काटा, आज उन्हें घरों से ही निकाला जा रहा है।

जहां विवाह-शादियों में बेटियों को डोलियों में विदा किया जाता था, आज स्टेज पर ही सारी औपचारिकताएं निभा दी जाती हैं। युवा खेलों को छोड़कर नशे को ही खेल समझ बैठे हैं। अपनी ताकत गलत कार्यों में लगाकर युवा पीढ़ी संस्कृति की जड़ों से कट चुकी है। पहले गुरु-शिष्य के संबंधों की महिमा लोगों की जुबां पर होती थी, आज युवा गुरुओं को सम्मान देने की बजाय कई बार तो सामने आने पर रास्ता बदल लिया करते हैं।

जहां त्यौहारों व रीति-रिवाजों को सामूहिकता व अपनेपन की भावना तथा संस्कृति के एक हिस्से के रूप में मनाया जाता था, समाज में हर्षोल्लास व भातृभाव रहता था, आज उन्हीं त्यौहारों पर बस सोशल मीडिया में बधाई के फोटो डालकर इतिश्री करना व ऐसे अवसरों पर नशा करने का प्रचलन बढ़ गया है, मानो आज के युवाओं को नशे करने के लिए अवसर चाहिए हो। त्यौहारों के अवसर पर जहां लोक संगीत व लोक संस्कृति का परिचय देखने को मिलता था, वहां आज ऊंची आवाज में डी.जे. लगाकर इन त्यौहारों की औपचारिकताएं पूरी होती नजर आती हैं।

बड़े-बड़े क्लब और शादी विवाह में होने वाले कार्यक्रमों में अक्सर युवाओं को शराब के नशे में धुत देखा जाता है उन्हें लगता है कि खुशियों में सबसे ज्यादा जरूरत शराब के नशे की है लेकिन वह नहीं जानते कि उनके आसपास से रहने वाले छोटे-छोटे बच्चे जो विवाह में सम्मिलित होते हैं जो ये सब देखकर वहीं सीखते हैं जो आप सब नशे की हालत में करते हैं। कई बार सुनसान इलाके में ले जाकर भी महिलाओं के साथ दुष्कर्म जैसी घटनाएं शादी विवाह में देखने मिलती है। लगभग संस्कृति को दरकिनार करके आधुनिकता मे अपने जीवन को दांव पर लगाने वाले युवा पीढ़ी ही नहीं महिलाएं भी कहीं ना कहीं इस गर्त में उतर गई है। फटे कपड़े पहन कर उसे फैशन का नाम देने वाली महिलाएं अक्सर जालसाजी मे फंसती है जो नाइट क्लब बगैरह मे धूम्रपान करते नजर आती है। आजकल टीवी पर दिखाने वाले प्रचार मे भी युवा अभिनेता सभी धूम्रपान करके इवेंट्स कंपनियों का प्रचार प्रसार करते हैं जो हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है।

जरूरत है समाज में जागरुकता की और अपनी संस्कृति को बढ़ावा देना जरूरी है वो पारम्परिक रूप से मनाए जाने वाले कार्यक्रमों पर जोर देना चाहिए। जन्मदिन हो या शादी की वर्षगाँठ, सब मे शराब इत्यादि बंद कर देना चाहिए। ताकि हमारी संस्कृति की छाप युगों युगों तक रहे।

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