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Poem : “अपनी आवाज”

✍️ बीनू सिंह, लखनऊ, (उ.प्र.)

ज़िद कर बैठी अपने से मैं,
नहीं किसी से अब डरना।
बहुत सुन लिया सब की बातें,
अब सबको है सब कहना।

कब तक जिऊंगी संकोच भाव में
कब तक सहूगी सब के ताने,
नहीं रही बर्दाश्त की सीमा
मैं भी आज की नारी हूं।

लड़ सकती हूं कह सकती हूं ,
गलत को न अब सह सकती‌ हूं ।
अपने सपने चुन सकती हूं,
आपने लिए भी जी सकती हूं।

ख़ामोशी को तोड़ूंगी,
अपना हक न छोडूंगी
मुझे भी चाहिए अपना आसमां
मुझे भी चाहिए अपनी आज़ादी।

ज़िद कर बैठी आपने से मैं
नहीं किसी से अब डरना।
अपने लिए अब कुछ करना

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