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Poem : “लौट आई हूं… “

✍️ मनीषा कुमारी

जहां पर छोड़ कर गई थी,
वही पर लौट आई हूं मैं…
सोची थी कुछ दिन दूर रहकर देखूं जरा दुनियां को,
सब कहते थे जो मैं कर रही हूं वो मंजिल नही है मेरी,

लेकिन मंजिल तो आज नहीं तो कल मिल जाएगी
पर तुझ जैसी संगिनी कहीं नहीं मिलेगी
देख ली दुनिया को, आजमा भी ली दुनिया को।
लेकिन तुझ जैसी वफा करने वाली नहीं मिलेगी
जो मेरे मन की बातों को शब्दों में पिरो देती है

मेरी भावनाओं को मेरी सोच को
हर एक सोच से मिला देती है
कोई भी नहीं मिलता दूजा तेरे सिवा तेरे जैसा
जो मन की बाते को शब्दों में पिरो देती हैं।

मेरी भावना मेरी सोच को .
हर एक सोच तक पहुंचाती हैं, .
कोई नही मिला दूजा कोई तेरे सिवा, .
मैं लौट आई अब वही उत्साह मन में उमंग लिए।

दिल की बाते मन की यादें लिखने के लिए,
दुनियां के बातों में अंधी हो चुकी थी,
कुछ पल के लिए तुझे भूल चुकी थी,
लेकिन मंजिल पाना और शौक पुरे करना।

हर इंसान की जिन्दगी में
ऐसा सुनहरा पल नही आता है,
आज जो मुझे मिला वो सब
परिवार के साथ- प्यार से मिला।

आज जो लोग मुझसे जलते हैं,
वो हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते है,
आज जो मैं हूं वो किसी का सपना होगा पाना,
अहम नहीं है मुझे किसी चीज की।

लेकिन गर्व है हमें अपनी परिवार पे,
जो हर पल हमारा साथ रहे,
बस सब को जान कर खुद को पहचान कर
आज मैं लौट आई हूं उसी राह पे
जहां से मुझे हर खुशी मिलती हैं,

मैं लौट आई हूं मेरी कविता मेरी कहानी
मेरी कलम मेरी जिंदगी मेरी शौक,
आज फिर से गर्व से सबको बताने आई हूं
हां हूं मैं कवियत्री हां हूं मैं लेखिका,
यही मेरी पहचान है यही मेरी आवाज हैं,

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